चिट्ठी आई है, आई है, चिट्ठी आई है,
दूर गाँव से दर्द की खुशबू लाई है।
बरसों बीते, आँसू पीते, इस वीराने में,
माँ की ममता, चौखट की परछाई है।
चिट्ठी आई है, आई है, चिट्ठी आई है...
| chitthi aayi hai ghaza |
(अंतरा 1 / Verse 1)
कागज़ के पन्नों पे लिखी है घर की उदासी,
रोती है आँगन की तुलसी, राह तकें हैं प्यासी।
तूने तो परदेस चुना, दौलत का रास्ता,
पीछे छूट गई बचपन की वो गलियाँ ख़ास सी।
धड़कन में फिर वतन की पुरवाई है,
चिट्ठी आई है, आई है, चिट्ठी आई है...
(अंतरा 2 / Verse 2)
सूनी है अब देहरी, सूने सब त्यौहार यहाँ,
किस काम का वो सोना, जब ना हो अपना जहाँ।
बाबूजी की लाठी पूछे, कब तू घर आएगा,
इक आवाज़ लगा दे, तरसे तेरे बोल को माँ।
आँखों में हर बूँद जो भर आई है,
चिट्ठी आई है, आई है, चिट्ठी आई है...
(अंतरा 3 / Outro)
छोड़ पराए मुल्क के साए, लौट के आजा अब,
टूटे दिल के तारों को फिर जोड़ के आजा अब।
ज़िंदगी की इस शाम से पहले अपने वतन को छू,
सारे झूठे ख़्वाबों को तू तोड़ के आजा अब।
मिट्टी ने फिर आज पुकार लगाई है,
चिट्ठी आई है, आई है, चिट्ठी आई है....





